लोमड़ी और बगुला (Moral Stories In Hindi 1)

एक लोमड़ी और एक बगुला दोनों दोस्त थे। लोमड़ी बगुले का छुप-छुपकर मजाक उड़ाती थी। लोमड़ी ने एक दिन बगुले का मजाक उड़ाने के लिए एक चाल चली।

एक दिन लोमड़ी ने बगुले से कहा, ‘मैं आज सूप बनाने जा रही हूं।  आज तुम मेरे घर शाम को डिनर पार्टी मनाने आना।” यह सुनकर बगुला खुश हो गया।  बगुले ने कहा, “बहुत-बहुत धन्यवाद। मुझे तो सूप  बहुत पसंद है।  आज शाम को डिनर पार्टी में मिलते हैं।

शाम होते ही बगुला ठीक समय पर लोमड़ी के घर पहुंच गया। वह बहुत भूखा था और सूप की खुशबू से तो उसके मुंह में पानी आने लगा था। तुरंत ही लोमड़ी ने सूप परोसा।

लोमड़ी और बगुला (Moral Stories In Hindi 1)

सूप की खुशबू सूंघकर बगुले ने कहा, “सूप तो बहुत ज्यादा स्वादिष्ट लग रहा है। ” लोमड़ी ने सूप को एक प्लेट में परोसा और बगुले के साथ सूप का स्वाद चखने लगी।  देखते ही देखते लोमड़ी अपनी प्लेट का सूप चट्ट कर गई।

बेचारा बबूला अपनी लंबी चोंच से किस प्रकार सूप का स्वाद ले पाता ? वह लोमड़ी का मुंह देखता रह गया। लोमड़ी ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा, “लगता है तुम्हें सूप पसंद नहीं आया। 

कोई बात नहीं, नहीं खा रहे हो तो छोड़ दो।” ऐसा सुनकर बगुले को बहुत दु:ख हुआ। वह लोमड़ी की चाल समझ गया लेकिन बगुले ने क्रोध नहीं किया, उसने लोमड़ी से कहा, “कोई बात नहीं, कल शाम तुम मेरे घर डिनर पर आना।” लोमड़ी ने बगुले का न्योता स्वीकार कर लिया।

अगले ही दिन लोमड़ी बगुले के घर डिनर पार्टी के लिए पहुंची।  लोमड़ी बहुत भूखी थी और बगुले के घर बनते हुए खाने की सुगंध से उसके मुंह में पानी आ रहा था। लोमड़ी ने थोड़ी देर खाने का इंतजार किया। बगुले ने खाना परोसा। 

बगुले ने लंबी सुराही में लोमड़ी को खाना परोसा और खुद भी लंबी सुराही में अपनी लंबी चोंच डालकर डिनर खत्म करने लगा। यह देखकर लोमड़ी को बहुत गुस्सा आ गया। लोमड़ी ने कहा, “मैं कैसे इस लंबे जार से खाना खा सकती हूं ?”

लोमड़ी और बगुला (Moral Stories In Hindi 1)

 बगुले ने उत्तर दिया, “जैसे कि मैंने प्लेट में खाना खाया था।” बगुले ने लोमड़ी को समझाया, तुम्हें जिस प्रकार का मजाक पसंद नहीं उसे दूसरे के साथ नहीं करना चाहिए,यदि तुम किसी को धोखा देते हो तो तुम्हें भी उसी प्रकार के धोखे के लिए तैयार रहना चाहिए। 

अब तुम्हें पता चला, कि मुझे कैसा लगा होगा ? लोमड़ी का सर शर्म से झुक गया।

Moral Of the Story: 1. Understand Others’ needs. Do not be mean to others.

                   2. Do unto others, as you would have them do unto you.

हवा और सूर्य (Moral Stories In Hindi 2)

एक बार हवा और सूर्य में बहस छिड़ गई। हवा ने कहा, “मैं तुमसे ज्यादा ताक़तवर हूं ?” सूर्य उत्तर दिया, “मुझे लगता है सादगी में ज्यादा ताकत होती है।”  मैं तुम्हें सीधा- सादा लग सकता हूं लेकिन मैं तुमसे ज्यादा ताक़तवर हूं। दोनों ने शर्त लगाई। सूर्य ने कहा चलो देखते हैं, कौन सबसे ज्यादा ताक़तवर है ?

नीचे एक यात्री सुनसान सड़क पर चला जा रहा था उसने एक कंबल ओढ़ कर रखा था सूर्य ने कहा, “चलो देखते हैं इसका कंबल कौन उतार सकता है ?”

हवा और सूर्य (Moral Stories In Hindi 2)

हवा ने हंसकर कहा, “यह तो मेरे लिए बहुत आसान होगा,” मैं तो चुटकियों में इसका कंबल उतार दूंगा। सूर्य ने कुछ नहीं कहा।  हवा ने कहा, “पहले मेरी बारी।”  जोर जोर से हवा चलने लगी, सड़क पर धूल उड़ने लगी, सारे जानवर आसपास भागने लगे। जहां तहाँ धूल और पत्तियां उड़ने लगी।

हवा से यात्री कांपने लगा और कंबल को अपने शरीर पर जोर से लपेट लिया। जितनी तेज हवा चलती, उतना ही यात्री अपने शरीर पर कंबल लपेट लेता।  आखिरकार कुछ समय बाद हवा ने हार मान लिया। हवा ने सूर्य से कहा, “यदि मैंने इसका कंबल नहीं उतार पाया है, तो तुम भी नहीं उतार पाओगे। इसलिए तुम भी अब प्रयास करना छोड़ दो। हम इस शर्त को यहीं खत्म करते हैं।

सूर्य ने कहा, “ठीक है, लेकिन मुझे एक बार तो प्रयास करने दो l” बिना प्रयास किए हार मानने से क्या लाभ ? हवा ने इसका जवाब नहीं दिया क्योंकि उसे पता था कि सूर्य यह नहीं कर पाएगा l सूर्य बादलों के पीछे छुपा हुआ था वह बादलों के बीच से निकलकर खुले आसमान में चमक उठा l

देखते ही देखते चारों तरफ गर्मी का माहौल होता गया। यात्री को गर्मी लगने लगी। उसने सोचा,”आज का मौसम कितना अजीब है ? कभी ठंडी हवा, कभी तेज धूप।” 

हवा और सूर्य (Moral Stories In Hindi 2)

उसे गर्मी लगने लगी और अंत में उसने अपना कंबल उतार दिया और उसे अपने कंधे पर रखकर जाने लगा। हवा ने हार मान ली। हवा ने सूरज सूर्य से कहा, “तुम जीत गए मैं हार गया” l  सूर्य ने कहा, “कभी-कभी बिना जोर-जबर्दस्ती किए सीधे-सादे तरीके से भी समस्या सुलझाई  जा सकती है।”

Moral of the Story : Fury or force does not get you anywhere, but gentleness does the job.

एक कंजूस (Moral Stories In Hindi 3)

एक समय की बात है एक गांव में मोतीलाल  नाम का एक कंजूस व्यक्ति रहता था। उसके पास बहुत सारा पैसा था लेकिन उसे खर्च करना पसंद नहीं था। वह किसी की भी पैसे से मदद नहीं करना चाहता था। उसके पास बहुत सारे सोने के सिक्के थे। यहां तक कि मोतीलाल को अपने परिवार के साथ भी पैसा बाँटना पसंद नहीं था। वह ग़रीबों की भी कोई मदद नहीं करता था।

उसका परिवार उसके इस रवैया से खुश नहीं था। वह अपने बीवी और अपने बच्चे का भी ठीक से ख्याल नहीं रखता था और उनकी जरूरत भी पूरी नहीं करता था। जब भी उसकी पत्नी पैसे से संबंधित कुछ सलाह देती तो वह उसे मामले में दखल देने से मना कर देता था।

एक दिन उसका बेटा बहुत बीमार पड़ गया मोती लाल की बीवी ने बच्चे को डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा लेकिन मोतीलाल ने कहा, “आजकल के डॉक्टर ठीक नहीं है, खूब पैसा लेते हैं।  बच्चा ठीक हो जाएगा, घर पर ही इलाज कर लो।” लेकिन उसकी बीवी को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और वह खुद ही अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले गई। 

एक कंजूस (Moral Stories In Hindi 3)

कुछ दिन बीत गए, मोतीलाल ने सारे सोने के सिक्के जो उसके पास रखे थे उसको पिघला कर एक बड़ी सोने की ईट बनाई। यह करते हुए उसे बहुत खुशी हो रही थी लेकिन उसे यह डर लगा कि कोई इसे चुरा ना ले इसलिए उसने इस सोने की ईट को अपने आंगन में मिट्टी के नीचे दबा दिया और रोज़ उसे खोदकर देखता और खुश होता। 

एक  दिन किसी ने उसकी सोने की ईट चुरा ली। मोतीलाल को पता चला कि आंगन में अब उसका गड़ा हुआ सोना चोरी हो गया है।  उसे बहुत दु:ख हुआ।  एक दोस्त ने उसे गड्ढे के पास रोता हुआ देखा। 

एक कंजूस (Moral Stories In Hindi 3)

दोस्त ने कहा, “गड्ढा खोदकर, सोना गड़ा कर, उसे रोज देखने से तुम्हें क्या सुख मिला, उल्टा तुमने अपना धन खो दिया क्योंकि तुमने उसे किसी काम नहीं लिया इसीलिए वह  तो तुम्हारे लिए एक पत्थर के समान सिद्ध हुआ।

देखो अब वह चोरी हो गया है और तुम्हारे लिए कुछ नहीं बचा। यदि तुमने इसमें से कुछ परिवार के लिए और जरूरतमंदों के लिए खर्च किया होता, तो वह तुम्हारे ज्यादा काम आता।

मोतीलाल को अपनी मूर्खता पर बहुत दु:ख हुआ और बहुत पछतावा हुआ। उस दिन के बाद से मोतीलाल ने ठान लिया कि अब वह कमाए हुए पैसे का जरूरतमंदों और परिवार की जरूरतों पर अवश्य खर्च करेगा और आज के बाद से कंजूस बनना छोड़ देगा। उसे अपने परिवार की भी अहमियत का एहसास हो गया।

Moral Of The Story :

The greatest joy comes from sharing what you have, and not from keeping everything for one’s own selfish needs.

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